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!! श्री आत्म वल्लभ समुद्र इन्द्रदिन नित्यानंद सद्गुरुभ्यो नमः !!
आध्यात्मिक संस्कृति की जन्मभूमि भारत युगों युगों से ज्ञान के निष्ठापूर्ण अर्जन के लिए प्रसिद्ध रहा है। ज्ञान द्वारा पोषित उदात्त जीवन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता के कारण यहां उस महान तथा मंगलकारी साहित्य की रचना हुई जो आज भी समूचे विश्व में आश्चर्य तथा प्रशंसा का विषय है। भारतीय संस्कृति ने ज्ञान को सदैव सर्वोच्च आदर किया है। उसकी दृष्टि में ज्ञान जीवन की सबसे पवित्र वस्तु है – नहि ज्ञानेन संदृश पवित्रमिह विध्य्ते। उसकी दृष्टि में ज्ञान बंधनो से मुक्त करने वाला सर्वोत्तम साधन है। मुक्ति का राजमार्ग सम्यक , ज्ञान , दर्शन तथा चरित्र नामक तीन मुलभुत तत्वों से होकर निकलता है। जिन्हे जैन परिभाषा में त्रिरत्न कहते है। सम्यकज्ञान- दर्शन तथा चरित्राणि – मोक्षमार्ग: नैतिक अनुशासन से रहित ज्ञान निरसार व्यायाम है। हमारे आध्यात्मिक आचार्यो ने जिस विश्वात्मा की परिकल्पना की थी , उसने भिन्नता तथा विविधता से परिपूर्ण संसार को घृणा तथा हिंसा रहित विश्व कुटुम्भ में परिवर्तित कर दिया। महान जैन आचार्यो ने समाज में करुणा ,अहिंसा आदि उद्दात मूल्यों के प्रसार के लिए अथक प्रयत्न किया। उनकी मान्यता है की समुच महान मूल्यों तथा भव्यताओं का प्रदुभार्व ज्ञान से होता है। समाज को अज्ञान के अंधकार से मुक्त करने के लिए उन्होंने श्रावकवर्ग को अन्याय लोकोपयोगी तथा मंगलकारी कार्यो के अतिरिक्त देश के कोने कोने में सरस्वती के मंदिर स्थापित करने को प्रेरित तथा उत्साहित किया।
महान आचार्य श्रीमद विजयानन्द सुरिश्वर जी जो आत्मा राम जी महाराज के नाम से अधिक प्रसिद्ध है , देश के विभिन भागो में शिक्षण संस्थाओ का जाल बिछा कर वस्तुतः शिक्षा के क्षेत्र में नयी क्रांति का सूत्र पात्र किया जाता है। श्रीमद विजय वल्लभ सुरिश्वर जी महारज उनके सुयोग्य तथा गुणवान शिष्य थे। उन्होंने अपने उदात्त व्यक्तित्व तथा चुम्बकीय प्रभाव से समाज को उन्नति के शिखर पर प्रतिष्ठित किया। इन गुरु शिष्य ने देश में उच्च शिक्षा के केंद्र स्थापित करने का अधभुत कार्य किया। श्री मद विजय नित्यानंद सुरिश्वर जी महाराज इन महान आचार्यो तथा शिक्षाविदों के महान शिष्य है। हनुमानगढ़ मार्ग पर विशाल प्रग्रण में स्थित श्री आत्म वल्लभ जैन कन्या महाविधायलय की स्थापना का श्रेय उनकी शिक्षा के प्रति अविचल प्रतिबद्धता और समर्पण को है। अपनी करुणामयी प्रेरणा से उन्होंने श्रीगंगानगर के जैन समाज को महान गुरुओं की स्मृति में इस विद्या मंदिर को स्थापित करने को प्रेरित किया।

हम उनकी दूरदृष्टि , करुणा तथा स्फूर्ति दायक प्रेरणा के प्रति नतमस्तक है।

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